Tuesday, January 8, 2013

वीरता

अमर यौवन की आग में जल कर
जो प्रलय पौरुष  तपते  हैं
सूर्य,धरा ,देव,मुनि,जन
उनके सम्मुख जा झुकते हैं 

चढ़ी प्रत्यंचा वीरो की जब जब
शत्रु कम्पित हो  उठते हैं
रौद्र रूप धर वीर ही  तब तब
नव क्रांति सृजन की करते हैं

असुरो के  भय  से जब जब
मानव त्रास हुआ हैं
कृष्ण रूप धर वीरो ने ही तब
तब उसका  संहार किया हैं

सिन्धु के उठते ज्वारो में 
जब दंभ नया उपजा  हैं
लेकर जन्म राम का, वीरो ने
उसका भी उत्थान किया हैं

शौर्य  के इस आदित्य को देखा
जब जब जिस यौवन ने
मातृभूमि, धर्म की रक्षा का
लिया शपथ उसने जीवन में

राष्ट्रधर्म की तपती ज्वाला में
प्राणों की आहुति जो देते हैं
सदियों तक उनके पौरुष ही
कवियों के ह्रदय में  बसते हैं

हाँ मैंने देखा हैं



मैंने  टूटे  हुए  ख्वांबो  के
उजड़ते  हुए आशियानों से
उठ  रही  चंगारियो  को 
करीब  से  देखा  हैं

 कांपती हुई  उम्मीदों पे
जलती  हुई त्रिष्णगी से
बुझ  रहे  अरमानो  को
खुद में ही मरते देखा  हैं

 हाँ  मैंने  देखा  हैं
सपनो  को  रेत  की  तरह
पानी  की  ज़िन्दगी  में
बहते, घुलते और मिटते  भी
आंसुओं को खून की तरह
बहते,रुकते और थमते भी  
हाँ  मैंने  देखा  हैं

Friday, October 19, 2012

कर्म, भाग्य और भारत


पत्थर, पेड़ , ब्रम्ह,अंगूठी
सबका  लिया  सहारा
पर  मूर्ति  को  पूजत  जन
कहा  कहा  न  हारा

भाग्य  कुंडली  ज्योतिष  ने  भी
उसको  हर  दम  धिक्कारा
सक्षम  होकर  भी  वो
हर  रोज  किसी  से  क्यूँ  हारा

 बैठ, सोच  कर  जग  में  किसको
मिलता  महल  वृहद्  हैं
उद्दयम    कर  धन  जिसने  पनपाया
उसकी   ही  चहु-ओर  विजय  हैं

भगत , आज़ाद  सुभाष  ने  भी
कर्म  कर  लोहा  अपना  मनवाया
फिर  क्यों  हे  मानस  के  राज  हंस
तुमने  ही  कर्म को  ऐसे  ठुकराया

रावण, कंस  को  भी  उसने
कर्म -युद्ध  कर संहारा
बैठ  बैकुंठ  में  जो हो सकता था
फिर  क्यूँ  नर -कर्म  का  लिया  सहारा

रामायण , वेद  शाश्त्र तुमने पढ़
गंगा से पापा भी धुलवाए
पर हुआ आश्चर्य  जगत को तुम पर
गीता  ही तूम शायद ना पद पाए

अंग्रेजो को ही  तुम देखो
घर में ही तुमको जम कर लूटा
पर कर्म-हीन मनु-जन तुम तो
राम कृष्ण से भी  कुछ ना  सीखा

राम  कृष्ण को  जग  पूजता
तुमने  भी  मूर्ती तो  बनवाई
पर  हे  इश्वर  के  बालक  तुमको
कर्म की सुध कभी ना क्यूँ आई

जीवन  विष  पी  सकता  वो  हैं
जिसका  कंठ  रूद्र  सरस  हो
उसका  क्या  जो  कंठ-हीन
कर्म हीन गरीब  सकल  हो

रचा  इतिहास उसी मानव ने
जिसने तट को दुत्कारा
तट की माया में फंस कर ही
कर्महीन लूट ता हरदम आया

सच  पूछो  तो  कर्म  से  ही
मिलता  सुख -ऐश्वर्य  सभी  को
धन-धान्य भाग्य  उसी  का  होता
जिसमे  शक्ति-कर्म-विजय  हो

                                                            'अभिषेक'

Saturday, August 25, 2012

राष्ट्रधर्म की बलिवेदी पे , एक दिया नया जलाएंगे




राष्ट्रधर्म की बलिवेदी पे, एक दिया  नया जलाएंगे  
नव जीवन को सृजन कर,नूतन भारत जन्मायेंगे                                                 

भूखे नंगे जन मानस को, हाँ मैंने अब तक देखा हैं
पंथ संप्रदाय पे लड़ कर , लोगो को मरते देखा हैं
क्या ऐसे जन मानस में, नव चेतना हम लायेंगे 
राष्ट्रधर्म की बलिवेदी पे,  एक दिया  नया जलाएंगे  

नारी का ता हाल न पूछो,  दासी सी किस्मत पाई हैं
लूट ते चीर की पीड़ा  को,  वो हर दम  सहती आई हैं 
पंथ, संप्रदाय, और धर्मग्रंथो,  ने  उसका उपहास उड़ाया हैं
क्या ऐसे दुर्बल  नारी के दम पे,  क्रांति नयी  हम ला पायंगे 
राष्ट्रधर्म की बलिवेदी पे,  एक दिया  नया जलाएंगे  

रुदिवादिता, आडम्बर को,  हमने सर्वदा गले लगाया हैं
भाग्य, कुंडली , ज्योतिष को,  हमने गौरव से अपनाया हैं 
वैज्ञानिक  चिंतन का हमने,  जमके उपहास उडाया हैं
जन- जन   में भद करा  के,  सामंती सोच को पनपाया हैं 
क्या ऐसे समाज में हम,  नव जाग्रति कभी ला  पायंगे 
राष्ट्रधर्म की बलिवेदी पे ,  एक दिया  नया जलाएंगे  

गंगा के कल कल, अविरल जल से  
अभिषेक. आचमन करना हैं
जन, गण, मन में, नव प्राण फूँक के 
भारत को अब निर्मित करना हैं
जाती, पंथ से अब उपर उठ कर
अब राष्ट्र धर्म अपनाना हैं
मानवता, करुणा की खातिर
नयी क्रांति हम लायेंगे

राष्ट्रधर्म की बलिवेदी पे ,एक दिया  नया जलाएंगे  
नव जीवन को सृजन कर , हाँ नूतन भारत जन्मायेंगे 

मैं दलित हूँ


 
                             

राजा, पंडित, पुजारियों  ने मुझको अछूत बतलाया हैं
इनका कचड़ा मैं ढोता, फिर मेरा क्यूँ उपहास उड़ाया हैं 
कुत्ते को तो पूरी रोटी दे देते, मुझको आधा खिलवाया हैं
सड़क, चौराहे, नाली, कुड़ो में घुसकर,  इनको  स्वच्छ बनवाया हैं
इनके धर्म,  धर्मग्रंथो ने फिर भी, मुझको खुल के नीच बताया हैं

मेरा तो परछाई पड़ने से, इनके धर्म भ्रष्ट हो जाते हैं
इनके माँ बापों का मैला मुझसे फिर क्यूँ  उठवाते हैं 
गाय को हाय ये माँ माने, मुझको पशुता से जुड़वाते  हैं
पत्थरो  को भी देव बनाये, मुझको कोड़ो से पिटवाते हैं
वृच्छो को भी ये पूजते , मुझको संवेदन शुन्य बताते हैं
मेरी व्यथा को ना माने, अपनी व्यथा पर  मुझको तड़पाते   हैं

मानव को  तो ये  मानव ना माने, मानवता का पाठ हमे पढाते हैं
हमे असभ्य ये कहते,  अपने को सभ्यता का हिस्सा बतलाते  हैं
खुद को सर्व श्रेष्ठ मानते, मेरा मान मर्दन क्यूँ फिर करवाते  हैं
मैं दलित कुचला, शोषित , अब तक मुझको धिक्कारा हैं
भारत के गौरव की बाते करते, मुझको क्यूँ  पीड़ा पहुचाया हैं

आधी रोटी मैं खाता, आधा पर  मेरा पेट नहीं
पूरी रोटी  मैंने जो खाली, दुनिया की फिर खैर नहीं
मान मेरा एहसान की, मैंने तेरा अब तक  काम  किया
राजा पंडित का मैंने फिर भी हर दम  सम्मान दिया 
धैर्य,सयम स्वभाव हैं मेरा, मैं तो  मजबूर नहीं 
तेरी सेवा मैं करता, मैं अब तो कमजोर नहीं
उठ, जाग गया मैं भी  देखो , मुझको अब सम्मान चाहिए
गाये पत्थरो, वृच्छो को पूजो, मुझको भी मेरा गौरव चाहिए

नारी सम्मानित होनी अब चाहिए



ममता, करुना की प्रतिमूर्ति 
नारी को गौरव अब चाहिए
रुदिवादिता, आडम्बर को ठुकराकर 
नारी सम्मानित होनी अब चाहिए

पुत्र की अंधी अभिलाषा ने
पुत्री को बोझ बनाया हैं
नारी ने खुद का मान गिराकर 
नारी का अवमूल्यन करवाया हैं
नारी का अब मूल्य बढाकर
उसे अमूल्य  बनवाना चाहिए
रुदिवादिता, आडम्बर को ठुकराकर 
नारी सम्मानित होनी अब चाहिए

संत, महात्मा, और पगाम्बरो ने 
नारी को हरदम  ठुकराया हैं
नौ माह कोख में उसके पलके
फिर क्यों जीवन को अपनाया हैं
नारी की उत्थान की खातिर
धर्मग्रंथो को अब जलना चाहिए
रुदिवादिता, आडम्बर को ठुकराकर 
नारी सम्मानित होनी अब चाहिए

पंडित, मोमिन, पादरियों ने
नारी को नरक बताया हैं
पाप, पुण्य के ठेकेदारों ने
उसका खुल के  उपहास उड़ाया हैं
नारी का यह मन मर्दन
अब तो रुकना चाहिए
रुदिवादिता, आडम्बर को ठुकराकर 
नारी सम्मानित होनी अब चाहिए

उठ, जाग, तोड़ दे बंधन को
खड्ग, कृपान संग दुःख क्रंदन को
देख , समझ, कर क्रांति तू
लड़ना तुझको अब चाहिए 
पीड़ा  को सहने की तो शक्ति
तुझसे ही पुरुषो को चाहिए 
दिया जनम पौरुष को तुने 
निर्बलता तेरी पहचान अब   
फिर से  नहीं बननी चाहिए

ममता, करुना की प्रतिमूर्ति 
नारी को गौरव अब चाहिए
रुदिवादिता, आडम्बर को ठुकराकर 
नारी सम्मानित होनी अब  चाहिए

अपना आखिरी अलविदा कह दिया



आज मैंने उनको अलविदा कह  दिया,
हंस  के  आंसुवो  से  जुदा  कर  दिया ,
ज़िन्दगी  के  इस  मुकाम  पे  आके ,
हमने  उस  मुकाम  को  अलविदा  कह  दिया, 

किसी  के  प्यार  ने  हमे  प्यारा  बना  दिया ,
मुझे  मुझसे  ही  को  मिला  कर  जीना  सिखा  दिया, 
यूँ  तो  हम  राह  के  पत्थर  थे ,
तराश  कर  मुझे  उसने , अपना  खुदा  बना  दिया ,

दे  ना  सके  उसको   हम ,
जो  उसने  हंस  के  हमे  दे  दिया ,
प्यार  की  थोड़ी  सी  ही  उम्र  में ,
उसने  उम्र  भर  का  प्यार  दे  दिया, 
यूँ  तो  वो  रात  की  तन्हाई  में  रोते  थे  अक्सर ,
पर  क्यूँ  मुझे  रोकर  मुस्कुराना  सिखा  दिया ,

हम  चले  गए  तुम्हे  छोड़   कर ,
तुम्हारे  सपनो  को  यूँ  मिटा  दिया, 
रात  के  अँधेरे   में  अब ,
फिर  से  हमने  अँधेरा  जगा  दिया ,
जो  दिया  तुमने  जलाया  था ,
आज  उसी  को  हमने  बुझा  दिया ,
और  आज  हंस  कर  मैंने  तुम्हे ,
अपना  आखिरी  अलविदा  कह  दिया,